समाज के लिए दहेज़ सम्मान कैसे बन गया है। Dowry System


दहेज़ पर क्यों नहीं होती चर्चा 

हमारे देश भारत में दहेज एक कुरीति नहीं सम्मान का सामान बन गया है। हाँ! ये बात जरूर है की इसे एक कुरीति माना जाता हैं मगर सिर्फ किताबो मे या स्कूलों में निबंध प्रतियोगिता में ही।  इससे अलग इसकी चर्चा न कही होती है ना ही इसपर कोई लिखता है।
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Source- Pixabay 

दहेज़ बनाती है बेटी को बोझ

वक्त के साथ दहेज़ की इस कुरीति ने समाज में अपनी जड़े और जमा ली है। भ्रूण हत्या और बेटी को बोझ समझने के विचारधारा के पीछे एक बड़ा कारण दहेज़ भी है।

बेटी के पैदा होने के बाद बाप बेटी के शादी के लिए पैसे जोड़ने लगता है, उसके नाम से बीमा करता है और बन पड़ता है तो जमीन य प्लाट भी लेता है। ताकि समय आने पर बेटी की शादी बेहतर जगह पर की जा सके। हलाकि बेटो के लिए इस तरह का कोई बंदोबस्त नहीं किया जाता।

इतने बंदोबस्त करने के बाद भी कई बार बेटी की शादी में जीवन भर की कमाई लगाने के बाद भी बाप को जमीन या घर बेचना पड़ जाता है। कई बार तो इतने में भी नहीं होता इसलिए बाप को लोन भी लेना पड़ जाता है।

लड़के वालो के लिए होता है सम्मान

मगर अगर लड़के वालो के बात की जाये तो दहेज़ सिर्फ धन-संपत्ति के तौर पर नहीं देखा जाता बल्कि ये सम्मान का सामान होता है। दहेज़ की रकम की चर्चा जबतक आठ-दस गांव में ना हो तब तक ये रकम कम ही होती है। दहेज़ लेने के बाद बाप शान से बताता है की बेटे को दहेज़ में दस लाख के साथ बुलेट मिली है। और दहेजुआ बुलेट को दोस्तों में लेजाकर ईतिराता है। दोस्तों को बैठाकर चौराहो और चाय की दुकानों पर घूमता है, ताकि आस पास और गांव जवार के लोगो को अपनी वैल्यू बता सके. 

अब तो दहेज की रकम लड़के के स्टेटस के हिसाब से फिक्स है। सिपाही का इतना, तो दरोगा का इतना, सरकारी मास्टर है तो फिर मुंहमांगी रकम। लड़के का पिता लड़की वालो से ऐसे पैसे लेता है जैसे उसने कभी लड़की के बाप को कर्ज दिया हो और उसकी वसूली करने आया है।

कई बार सब कुछ तय होने के बाद, लड़की के पिता के पास शादी से ठीक दो दिन पहले फोन आता है की "देखिये तय तो गाड़ी स्पेलेंडर ही हुई थी मगर लड़के की पसंद बुलेट है, आप मैनेज कर लीजिए" अब बाप मैनेज कहा से करे तब रिश्तेदारों के सामने हाथ फ़ैलाने के सिवा कोई चारा नहीं होता।

मैंने दिया इसलिए लूंगा वाली विचारधारा

कई लोग कहते है की उन्हें दहेज़ इसलिए चाहिए क्योकि उन्होंने अपने बहन या बेटी की शादी के लिए दहेज़ दिया था। ये मामला वैसे ही है जैसे  की "मैंने अपने बेटी के लिए दूल्हा ख़रीदा इसलिए अपने बेटे को बेच रहा हूँ।" मतलब क्या विडंबना है! जिस विचारधारा ने या कुरीति ने आपको परेशान किया, आपको रिश्तेदारों के आगे हाथ फ़ैलाने पर मजबूर किया आप उसे ही आगे बढ़ा रहे है।यानि आप खुद नहीं चाहते की ये कुरीति समाज से ख़त्म हो। 


दहेज़ सम्मान नहीं दूल्हे की खरीद फरोख्त है

दहेज़ कोई सम्मान की बात नहीं और ना ही इससे आपका स्टेटस पता चलता है। बल्कि आप एक नए और पाक/पवित्र  बहुमूल्य रिश्ते का आंकलन चंद पैसो से कर देते है और जिन रिश्तो की बुनियाद पैसे पर टिक गयी हो उस रिश्ते में न मधुरता रहती है और ना ही मजबूती।

एक बाप आपको अपना सबसे कीमती चीज दे रहा है,अपनी बेटी। जिसे वह बड़े नाजो से पालता है। दुनिया की हर खुशिया उसके लिए त्याग करता है, उसे बेहतर तालीम और संस्कार देता है। इतनी कीमती चीज के साथ आपको और क्या चाहिए। क्या आप इस कीमती और अनमोल रिश्ते को रूपये से तौल लेंगे क्या? नहीं तौल पाएंगे। फिर क्यों दहेज़ लेते है, मत लीजिये ना!

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