Opinion- दिल्ली दंगो में न्यूज़ चैनल की भूमिका क्या है!

19 जनवरी को मै अपने एक मित्र गौरव को साथ लेकर रात के बारह बजे देश की सबसे बड़े सूबे की राजधानी लखनऊ में घूम रहा था। दरअसल हम देखना चाहते थे, इस भयानक ठण्ड में उन लोगो का क्या हाल है जिनका घर सड़क के किनारे पैदलपथ पर ही बसता है, जिनकी हर रात सड़क के किनारे ही गुजरती है।

दो दिन पहले ही बारिश हुई थी जिसके कारण ठण्ड अब पहले से ज्यादा बढ़ चुकी थी। हवाओ में हाड़ कपाने वाली गलन थी। इतनी भयानक ठण्ड में भी अनगिनत लोग सड़क पर सो रहे थे।

जब हम कामता चौराहे से पॉलिटेक्निक चौराहे के तरफ बढे तो हमें एक रैन बसेरा दिखा जो पॉलिटेक्निक चौराहे से गोमती रिवर फ्रंट की तरफ जाने वाली सड़क के बीचो बीच चौड़े डिवाइडर पर बनाया गया था। वहा के इंचार्ज ने हमें बताया की बारिश होने के कारण गद्दे और रजाई भीग चुके है, कई लोग आ रहे है मगर व्यवस्था ना होने के कारण उन्हें वापस जाना पड़ रहा है।

इंचार्ज से बातचीत हो ही रही थी की तभी रॉबिनहुड NGO के लोग आ गए वो अपने साथ कुछ खाने के पैकेट लाये थे। पूछने पर बताया की ये वो खाना है जो शादी-विवाह में बच जाता है। इसे वहा से लेकर हम लोगो में बाट देते है, इससे खाना वेस्ट नहीं होता और गरीबो का पेट भी भर जाता है।

वहा से आगे बढ़ने पर तस्वीरें और भी भयावह थी। ऐसे बहुत से लोग मिले जो सड़क पर ही सो रहे थे। कई रिक्शे वाले तो अपने रिक्शे पर ही सो रहे थे। हमने ये निश्चय किया की हम किसी सोते हुए को नहीं जगायेंगे मगर इतनी ठण्ड और तेज आवाज़ वाली गाड़ियों के बीच कई ऐसे थे जिन्हे नींद नहीं आ पाई थी।

सड़क पर ही हमारी मुलाकात एक बूढ़े कमजोर रामकिशन से हुई जो बिहार के थे और यहाँ लखनऊ में पिछले बारह साल से रिक्शा चला रहे थे। बातचीत में उन्होंने बताया की अपने रिक्शे की मदद से वह दिन के डेढ़ सौ से दो सौ कमा लेते है। जिनमे से चालिश उन्हें रिक्शा मालिक को देने पड़ते है। ये पूछने पर की इतने में कैसे काम चलता है, भावुक हो गए बताने लगे की कुछ महीने पहले ही बेटी की शादी की है तीस-चालीस हजार कर्ज है मूलधन तो उतरा नहीं ब्याज चढ़ा जा रहा है।

इस कहानी को यही रोकते है, मगर ऊपर की बातो को पकड़ कर रखियेगा। आपको पता होगा की दिल्ली में हुए दंगो की आग में चालिश से ज्यादा लोग अपनी जान गवा चुके है और दो सौ ज्यादा अभी भी अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहे है।
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इस दौर में जब हम भारत को विश्वगुरु बनाने का सपना देख रहे हो उस समय देश की राजधानी दिल्ली में तीन दिन तक दंगो की आग में जलती रही है, क्या आप कल्पना कर सकते है की किसी विकसित देश में ऐसा हो। क्या आप कल्पना कर सकते है की अमेरिका या ब्रिटेन या फिर फ्रांस में कोई शहर तीन दिन तक जले। चलिए छोड़िये आप उन देशो के नाम बताइये जिस देश में ऐसा होता है?


दंगो में संलिप्त लोगो की जांच होगी जैसे पहले हुई है, जांच में क्या होगा ये आप भी जानते हैं। मगर आरोप की एक ऊँगली देश के मीडिया के तरफ भी उठती है, हाँ वही मीडिया जिसकी जिम्मेदारी है की वह देश के हजारो रामकिशन की कहानी देश के सामने रखे। सड़क पर सोने वाले लोगो को लेकर सवाल करे। मगर वो ऐसा नहीं करती है।

पिछले कुछ सालो में भारतीय मीडिया ने अपना स्तर इतना गिरा लिया है की अब उसे मीडिया कहने से पहले मीडिया की परिभाषा बदलनी पड़ेगी, और मै ये इसलिए नहीं कह रहा हूँ की भारतीय मीडिया की रैंकिंग वर्ल्ड फ्रीडम इंडेक्स में 140/180 है।

जिस देश में लाखो लोग को पीने का पानी नहीं मिलता, लोगो की जीवन भर की कमाई प्राइवेट अस्पताल और प्राइवेट स्कूल चूस लेते है, वहा की मीडिया के लिए आम लोगो के ये मुद्दे, मुद्दे नहीं होते।

इसके इतर हर शाम न्यूज़ चैनलो में चार से दस बजे के बीच नफरत की पुड़िया बाटी जाती है। डिबेट के नाम पर लोगो को लड़ना पैनलिस्ट और एंकर का शोर उनका चिलाना आज यही भारत की मीडिया का सच है। लेकिन जब व्यूवर्शिप, और TRP से न्यूज़ की गुणवत्ता नापी जाने लगे तो इससे ज्यादा आपको कुछ मिल भी नहीं सकता।

न्यूज़ चैनेलो ने लोगो को ये बताना शुरू कर दिया की या तो आप हिन्दू हैं या मूसलमान, हिंदुस्तानी तो आप बाद में है और इंसान तो आप है ही नहीं। न्यूज़ चैनल से बटने बाली नफरत लोगो के नस-नस में खून बनकर बहने लगी, और जब ऐसा होता है तो फिर इंसान, इंसान को इंसान नहीं हिन्दू या मूसलमान समझता है।


दंगो की आग में जले हुए घर, स्कूल और दुकाने फिर बन सकती है, इस आग में अपनों को खोने वाले हो सकता है जल्द ही इस गम से उबर जाये, मगर दिल्ली में सबसे ज्यादा नुकशान आपसी भाईचारे, प्यार और इत्तेहाद का हुआ है जिसे कायम करने में कई दसक लगे थे। दिल्ली हमेसा से दिलवालो की रही है।

मुझे पूरी उम्मीद है दिल्ली वाले जल्द ही नफरत की धुओं से पार पाकर फिर से मोहब्बत के बागान लगाएंगे। मगर क्या देश की मीडिया नफरत और TRP की अपनी भूख से पार पा पायेगी?
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