क्या है Masjid E Aqsa का इतिहास

Masjid E Aqsa क्यों है फिलिस्तीन और इसराइल विवाद का केंद्र 

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Masjid e Aqsa
मुसलमानो के लिए तीसरी सबसे खाश मस्जिद मस्जिदे अक्सा की तारीख बड़ी लम्बी है. माना जाता है की इस मस्जिद की तामीर आदम(A.S.) के ज़माने में ही हुई थी.  मुसलमानो के लिए ये मस्जिद मक्का और मदीना के बाद सबसे खाश जगह है. मुसलमान इस मस्जिद को "बैतूल मुक़द्दस" और "अल हराम अल शरीफ" के नाम से भी जानते है.


क्यों खाश है मस्जिद

1.इसराक और मेराज

इसराक का मतलब है रात के एक हिस्से में चलना, अल्लाह के हुक्म से जब जिब्रईल हज़रात मुहम्मद(S .A .W.) को मेराज के सफर पर ले जाने के लिए आये तो उन्होंने उससे पहले मस्जिदे हराम से मस्जिदे अक्सा की भी यात्रा कराइ

इस सफर के लिए जिब्रईल जन्नत से एक सफ़ेद घोड़े जैसा जानवर लाये थे जिसे बुरक कहा जाता है, आम तौर पर उस समय इस दुरी को तय करने में चालिश दिन लगते थे, अल्लाह नई इस वाक़ये को कुरान के 'सूरह बनी इस्राइल' में बयान फ़रमाया है-
“क्या ही महिमावान है वह जो रातों-रात अपने बन्दे (मुहम्मद) को प्रतिष्ठित मस्जिद (काबा) से दूरवर्ती मस्जिद (अक़्सा) तक ले गया, जिसके चतुर्दिक को हमने बरकत दी, ताकि हम उसे अपनी कुछ निशानियाँ दिखाएँ। निस्संदेह वही सब कुछ सुनता, देखता है”

मस्जिदे अक़्सा ही वह जगह है जहा से हजरत मुहम्मद(S .A .W.) ने मेराज के सफर की शुरुआत की थी.  इसी मस्जिद में हजरत मुहम्मद (S .A .W.) ने नबियो की इमामत की थी.  और उसके बाद वह जिब्रईल के साथ मेराज के सफर पर गए.
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2.मुसलमानो के लिए है "मस्जिदे अव्वल"

मुस्लिम इतिहास में इस मस्जिद को मस्जिदे अव्वल कह कर पुकारा जाता है. क्योकि हज़रात मुहम्मद के ज़माने में जब तक काबा पर मुशरिको का कब्ज़ा रहा और उसमे बूत रखे रहे तब तक मुसलमान इस मस्जिद के तरफ ही मुँह करके नमाज पढ़ते थे.

क्या है यहूदियों का दावा-

हजरत मुहम्मद(S .A .W.) के बाद जब अल्लाह ने नबूवत ख़त्म की तो अल्लाह ने आसमानी किताब क़ुरान की क़यामत तक हिफाजत का वादा किया जो की बाकि की आसमानी किताबो के लिए नहीं किया था. यही कारण है की तौरात, जबूर और इंजील के असली रूप को उसके मानने वालो ने ख़त्म कर अपने हिसाब से उसे कई हिस्स्सो में बाटा और मनगढंत कहानिया लिखी.

 यहूदियों ने अपने किताबो में भी कई मनगढंत कहानिया लिखी. यहूदी कहते है की मस्जिदे अक़्सा ही वह जगह है जहा उन्हें सोलेमन टेम्पल बनाना है. जब वह ऐसा कर लेंगे तो उन्हें वह चमत्कारी किताब हासिल होगी जिससे वह दज्जाल को बुला सकेंगे. जिसके आने से दुनिया भर में इस्लाम का खत्म हो जायेगा.

क्या है मस्जिद का इतिहास

दुनिया के सबसे पुराने शहर जेरुशलम में स्थित मस्जिदे अक्सा का इतिहास बहुत पुराना है यह मस्जिद आदम(A.S.) के समय तामीर की गई थी. और उसके बाद आने वाले सभी नबी (हज़रात याकूब, हज़रात दाऊद, हज़रात सुलेमान, हज़रात इब्राहिम, हज़रात इस्माइल और हज़रात मूसा) के ज़माने में इसे इस्लाम की खाश मस्जिद माना गया.

इस मस्जिद की इमारतों को कई बार नुकशान पंहुचा है, 746 ई. में भूकंप में मस्जिद को काफी नुकशान पंहुचा था जिसके बाद अब्बासिद खिलाफत के दूसरे खलीफा अबू 'जफर अल मंसूर' ने इसकी मरम्मत कराई. इसके बाद 774 में भी इस मस्जिद को भुखमप से नुकशान हुआ तब अब्बासिद खिलाफत के तीसरे खलीफा ने इसकी मरम्मत कराई.इस बीच मस्जिद में हमेशा नमाज कायम रखा गया.

मस्जिद पर क्रूश ईसाइयो का कब्ज़ा

1099 में वो काला दिन आया जब जेरुशलम पर क्रूश का कब्ज़ा हो गया,1996  में  यूरोप से निकला कट्टर ईसाइयो ये समूह धर्मयुद्ध की नियत से पूर्व की और बढ़ा और खूब खून खराबा किया और जेरुशलम को 1999  में अपने कब्जे में लेकर इस पाक मस्जिद को सोलेमन टेम्पल नाम से दिया.

इसकी ईमारत में बदलाव किया गया और ईमारत 'ऑगस्टीनियंस' के हवाले कर दिया गया. अक्सा की दीवारे गवाह बानी जब उसके भीतर शराब के बोतल उछाले गये और बेसर्मीया आम हुई.

सैयद सलाउद्दीन अयूबी का जेरुशलम फतह करना

1187 में 88 साल के बाद सलाउद्दीन अयूबी ने धावा बोला और महज बारह दिन में जेरुशलम पर फिर से मुसलमानो का कब्ज़ा हुआ. सलाउद्दीन ने मस्जिद की दीवारों की मरम्मत कराई, क्रूश के बेहयाई के अड्डे हटवाए, मस्जिद के फर्श पर महंगी कालीन बिछाई गई और महज एक हफ्ते भीतर मस्जिदे अक्सा में फिर अज़ान की आवाज़ गुजने लगी.

आज की मस्जिदे अक्सा

1922  में जेरुशलम के ग्रैंड मुफ़्ती 'अमिन अल हुसैनी' ने टर्की के आर्किटेक्ट 'अहमत कमालद्दीन' की मदद से मस्जिद में कई मरम्मत के काम कराये जो 1924  से 1925  तक चला. जिसमे मस्जिद के मेहराब, खम्बो की मरम्मत की गई और मस्जिद की दीवारों पर और मेहराब पर सोने और हरे जिप्सम से शिल्पकारी की गई और लकड़ी के खम्बो को हटाकर पीतल से बनाया गया.

मस्जिद क्यों है, फलीस्तीन और इसराइल के विवाद का केंद्र

1947 में द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बड़ी तादात में यूरोपीय यहूदियों को फलीस्तीन में बसाया गया (उस समय फिलिस्तीन ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था)  जिसके कारण फिलिस्तीन की आबादी में यहूदियों की संख्या में बहुत इजाफा हुआ, 1922 में हुए सेंसस में फिलिस्तीन में मुसलमानो की संख्या 78 % थी, मगर धीरे-धीरे यहूदियों की संख्या में इजाफा हुआ। 1931 में हुए सेंसस में यहूदियों की संख्या में इजाफा 108% से ज्यादा था.

1.UN का प्रस्ताव

UN ने 1947 में  फिलिस्तीन में यहूदियों के अलग देश Israel का प्रस्ताव लाया गया जिसमे यहूदियों को फिलिस्तीन की 55% जमीन देने की बात कही गई जिसका अरब देशो ने विरोध किया. जिससे इसराइल और अरब में तनाव बढे और 1948 में अरब- इजराइल युद्ध हुआ। इस युद्ध में इजराइल को जीत मिली और उसे कुछ और शहरो में कब्ज़ा करने में सफलता मिली.

2.जेरुशलम पर कब्ज़ा

1967 में एक बार फिर अरब और इसराइल आमने सामने आये इस बार अमेरिका भी इजराइल के साथ था. इस युद्ध में अरब का सबसे ज्यादा नुकशान हुआ मिस्र, जॉर्डन और सीरिया के कई शहरो के साथ मुसलमानो के पाक शहर जेरुशलम पर इसराइल का कब्ज़ा हो गया.तब वेस्ट बैंक से 300,000 से ज्यादा फिलस्तीनियों ने वेस्ट बैंक छोड़ दिया और 100,000 से ज्यादा सीरियन गोलन हाइट छोड़कर दूसरे जगह चले गए.

1967 में इसराइल और जॉर्डन में एक समझौता हुआ जिसमे कहा गया की मस्जिद के कंपाउंड का जिम्मा इस्लामिक ट्रस्ट "वक्फ" करेगी जबकि मस्जिद के बहार की जिम्मेदारी इजराइल की होगी. गैर मुसलमान भी मस्जिद में जा सकेंगे मगर नमाज के वक्त सिर्फ मुसलमानो को आनद जाने की इजाजत होगी. 

पिछले कुछ सालो में जेरुशलम में खूब खून बहे है, 1990 में इस्राइली पुलिस ने बीस फिलिस्तीनियों को मस्जिद में मार दिया था. आम झड़प में भी इस्राइली पुलिस फिलिस्तींयो को गोली मार देती है.

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Rajab Tayyab Erdogan with palestine Image

इजराइल ने UN के नियमो का भी खूब उलंघन किया है. 2019 में यूनाइटेड नेशन के आम सभा में बोलते हुए तुर्की के राष्ट्रपति ने यूनाइटेड नेशन से कहा "क्या यूनाइटेड नेशन के नियम तोड़ने के लिए होते है. क्योकि इजराइल ने अनगिनत बात यूनाइटेड नेशन के नियम तोड़े है". 


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